बांधाएं आती है
और आती ही रहेंगी
वो आंखों की नींद
और मन का चैन उड़ा देती है।
अगर जिंदगी हमको प्यारी है
और है शांति की आस
तो मन से क्यों नही मानते है हम कि
कदम मिलाकर चलना होगा।
ऐसा पल कभी नही आया
और शायद कभी नही आयेगा
कि खुशियां हरपल
हमारा साथ दें और देता ही रहें।
इस कलियुग में तो प्यारें
मानवता भी दांव पर लगा है
आप सभी भली भांति परिचित है
कौन कर रहा है,परहित पर अर्पित
अपना तन मन।
अपना सोंच बदलना होगा
कदम मिलाकर चलना होगा।
व्यस्ततम जीवन की घड़ी में
किसको इतना फुर्सद है
हमनें क्या खोया है क्या पाया है
इसका चिंतन कर सकें।
आत्मविश्वास के साथ में
हाथ उठाकर यह कहने की हिम्मत
हममें से किसी में नही है कि
हमारा जीवन सफल हो गया है।
इसीलिए तो कहता हूं प्यारें
अपना सोंच बदलना होगा
कदम मिलाकर चलना होगा।
नूतन लाल साहू
