हर सफर कुछ सिखाता है


हर सफर कुछ सिखाता है

चलते चलते गिरना
गिरकर फिर उठना
कभी हंसाते कभी रुलाते है
हर सफर कुछ सिखाता है।
याद करो उन लम्हों को
बचपन बीता गई जवानी
बनो विद्वान बनो विदूषी
हर सफर कुछ सिखाता है।
कोई नही इस दुनिया में शाबासी देने वाले तो
मायूस न होना प्यारें
मानव धर्म निभाइयें
हर सफर कुछ सिखाता है।
उन लोगों को क्या कहें
कटु है बोल जी जिनके
तुझमें शक्ति अपार है
हर सफर कुछ सिखाता है।
न शाम का ठिकाना है
न दिन का ठिकाना है
बीता हुआ पल वापस नही आता है
हर सफर कुछ सिखाता है।
कुछ खोने,पाने का न कर गम
सुन मुसाफिर चलता चल
प्यास बुझती ही कहां है
हर सफर कुछ सिखाता है।

नूतन लाल साहू की कलम से 

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